बड़े दिनों के बाद

बड़े दिनों के बाद आज
सूरज से पहले जगी,
बड़े दिनों के बाद सुबह की
ठंढी हवा मुझपर लगी।

बड़े दिनों के बाद पाया 
मन पर कोई बोझ नहीं,
बड़े दिनों के बाद उठकर
सुबह नयी-नयी सी  लगी।

बड़े दिनों के बाद दिन के
शुरुआत की उमंग जगी,
बड़े दिनों के बाद मन में 
पंख से हैं लगे कहीं।

बड़े दिनों के बाद आज
मन में एक कविता उठी,
बड़े दिनों के बाद आज,
कविता काग़ज़ पर लिखी। 

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Kehnay Ko Muhabbat Hai Lakin – Poetry

Kehnay Ko Muhabbat hai lakin 
Ab esi muhabbat kia kerni… 
Jo neend chura le ankhon se 
Jo khawab dikha k pholon k 
Tabeer main kantay de jai 
Jo gham ke kali raaton se 
Her aas ka jugnu le jai 
Jo khawab sajati ankhon ko 
Aansu he aansu de jai 
Jo mushkil ker de jeenay ko 
Jo marnay ko asaan keray 
Woh dil jo Pyar ka mandir ho 
Wo yadoon ko mehman kare 
Ab Aisi Muhabbat kaya karni… 
Jo umer ki naqdi le jaey 
Aur phir bhi jholi khali ho 
Woh soorat DIL ka rog Baney 
Jo soorat dekhi bhaali ho 
Jo Qais bana de Insan ko 
Jo Ranjha Aur Farhad karay 
Ab Aisi Muhabbat kya karni..? 
Jo khushiyon ko Barbad kare 
Dekho to Muhabbat k Baray 
Har shakhs yahi kuch kehta hai 
Socho to Muhabbat k Ander 
Ik Dard humesha rehta hai 
Phir Bhi Jo cheez MUHABBAT hai 
Kab In baaton se Darti hai 
Kab in k baandhay rukti hai 
Jis DIL main iss ko Basna ho 
Yeh Chupkay say Bas jati hai 
AB AISI MUHABBAT KIA KARNI…??? 

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जनम दिन हमारा

निशा की चादर का मोड़ कर किनारा
नभ के आंगन में खिला उजियारा
आस्था के फूल करूँ ईश्वर को अर्पित
कमजोर घड़ियों में प्रभु हो तेरा सहारा
खुशियों के नुपूर बजने लगे रुनझुन
आज सुनेहरा जनम दिन हमारा  |

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आज़ादी की एक और वर्षगांठ

गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे |
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||
सभी मनाते पर्व देश का आज़ादी की वर्षगांठ है |
वक्त है बीता धीरे धीरे साल एक और साठ है ||
बहे पवन परचम फहराता याद जिलाता जीत रे |
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे |
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||
जनता सोचे किंतु आज भी क्या वाकई आजाद हैं |
भूले मानस को दिलवाते नेता इसकी याद हैं ||
मंहगाई की मारी जनता भूल गई ये जीत रे |
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे |
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||
हमने पाई थी आज़ादी लौट गए अँगरेज़ हैं |
किंतु पीडा बंटवारे की दिल में अब भी तेज़ है ||
भाई हमारा हुआ पड़ोसी भूले सारी प्रीत रे |
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे |
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||

Few lines by Dr.Kumar Vishvas

भाग-दौड़ का दिन ! उम्मीद और आशा छलक-छलक
दिखी ! हम लोग लगभग एक हज़ार साल गुलाम रहे ! अलग-
अलग कबीलों के ! शायद इस लिए गुलामी इतने गहरे उतर
गयी है कि कुछ लोग बेहद हताश हैं और
बड़ी नकारात्मकता से भर गए हैं ! “अजी कुछ
नहीं हो सकता इस देश का “, “अरे यार सब
साला ड्रामा है ” ,”इनका भी कुछ दूसरा अजेंडा होगा “,
“अरे भैया बड़े-बड़े मगरमच्छ हैं ये नेता लोग, ये अन्ना जैसे
पाँच-दस

 लोगों इन का कुछ नहीं बिगाड़ सकते, कुछ दिन में
लड़-मर जायेंगे ये लोग भी ” ! सुन-सुन कर मन करता है
कि किसी प्रकार काल-चक्र को उल्टा घुमा कर इन्हें
अंग्रेजी-गुलामी के दिनों में ठेल दूँ ! अरे
नहीं होगा तो नहीं होगा ! कम से कम से मरते समय
तसल्ली तो रहेगी कि बेचैन नहीं जिए,जितनी जान
थी उसे सिर्फ जान बचाने के जुगाड़ में ही नहीं लगाया !
कल से भिड़ेंगे ….बचे तो बचा अनाचार मिटाने फिर
भिड़ेंगे ! क्यूँकी पहले लड़े थे गोरों से अब लड़ेंगे गोरों से …!
कह गए हैं चचा …
“रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल ,
जब आखँ ही से न टपका तो फिर लहू क्या है….”
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चलो उसके बिना जीकर देखते हैं, कुछ दोस्तों ने दिया जहर पीकर देखते हैं…

चलो उसके बिना जीकर देखते हैं,
कुछ दोस्तों ने दिया जहर पीकर देखते हैं….
एक दिन ये मंज़र बदल जाएगा..?
पत्थर दिल भी पिघल जाएगा………

… … गहरा है घाव सी कर देखते हैं,

चलो उसके बिना जीकर देखते हैं…..
कुछ दोस्तों ने दिया जहर पीकर देखते हैं….

बदले जो हालत वो भी बदल गया,
सूरज की गर्मी से चांद पिघल गया,
रोना बेअसर, आंसुओं को पीकर देखते हैं………

चलो उसके बिना जीकर देखते है,
कुछ दोस्तों ने दिया जहर पीकर देखते हैं…..

जिसका नाम लेता हु दिन में कई बार .
.उसी नाम ने ….जहर दिया पीकर देखते हैं…….पीकर देखते हैं………पीकर देखते हैं……….

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विज़न २०२०

हरी नीली लाल पीली 
बड़ी बड़ी तेज़ रफ्तार मोटरें 
और उनके बीच दबा, 
सहमा, डरा सा 
आम आदमी 

हरे भरे लहराते बड़े बड़े 
पेडो के नीचे बिखरी पन्निया 
बारिश की प्रदुषण धुली बूँदें 
आँखों से बरसती 

सड़क पर चाय के ठेले पर 
वही बुढ़िया और 
चाय पहुचता 
वही छोटू 

स्कूल से निकलता अल्हड, मस्त 
किल्कारिया भरता बचपन 
और पास ही सड़क पर 
भीख मांगते नन्हे, 
असमय बड़े हो चुके 
छोटे बच्चे 

पाँच सितारा अस्पताल का 
उद्घाटन करते प्रधान मंत्री 
की तस्वीर को घूरती 
सरकारी अस्पताल में 
बिना इलाज मरे शिशु की लाश 

और इन सबको 
कर उपेक्षित 
विकास के दावो की होर्डिंग निहारता मैं 
मन में दृढ़ करता चलता विश्वास 
की हाँ २०२० में 
हम विकसित हो ही जाएँगे 
दिल को बहलाने को ग़ालिब………

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करेंगे एक और संघर्ष

करेंगे एक और संघर्ष
आओ करें संकल्प
इस स्वाधीनता दिवस पर,
करेंगे एक और संघर्ष
पाने को स्वतंत्रता
भ्रष्टाचार से 
जिसने
जगह बनाई है
स्कूल से लेकर
संसद तक में
अधिकारी शिकायतकर्ता 
का ही करते हैं उत्पीड़न
दौलत जुटाते हैं
करके पड़पीड़न
केवल काम नहीं चलेगा
झण्डा फहराने से
कब तक काम कराते 
रहोगे नजराने से
जिस स्वतंत्रता की खातिर
दिए थे प्राण जांबाजों ने
आज उसी देश को लूट लिया
झूठ को कला समझने वाले कलाबाजों ने
आओ हम हाथ मिलायें,
अनुशासन की जंजीरों को भी चटकायें
भ्रष्ट अधिकारी हो या नेता,
या फिर उनका हो प्रणेता,
कानून तो उनकी मुठ्ठी में है,
सच्चा कानून तो जन-हित है,
जिसकी खातिर तोड़कर 
सारी जंजीरे
आओ उनको मजा चखाये
स्वाधीनता को बचाना है तो
भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलायें
उन्होंने स्वतंत्रता की वेदी पर
किये थे प्राण निछावर
अपने स्वार्थों को छोड़
कोई भी मूल्य चुकाने को
होना होगा तैयार
तभी हम स्वतंत्रता के होंगे
सच्चे हकदार
अन्यथा यह नाटक है बेकार
आओ करें संकल्प
इस स्वाधीनता दिवस पर,
करेंगे एक और संघर्ष
पाने को स्वतंत्रता
भ्रष्टाचार से।

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लोकतंत्र के सपने

.एक हाथ में लोकतंत्र के सपने 
दूसरे में बारूदी छर्रे! 
बोलिए-हिप-हिप हुर्रे! 
एक तरफ़ भूखे एहसास;
दूसरी तरफ कसाई! 
जी हाँ, आपने भी 
सही जगह बस्ती बसाई!
पेट में उगते हैं मौसम,
चूल्हे में सुबह-शाम! 
बाकी जिंदगी तो होती है, 
सड़कों पर तमाम | 
आस्तीनों में पलते हैं दोस्त, 
म्यानों में मिलते हैं संबंध! 
मखमल के हैं संबोधन,
लेकिन टाट के हैं पैबंद! 
पर, मेरे वैचारिक सहचरो! 
वोट देते ही रटने लगो-
संविधानी मंत्र! वरना
फिर किस तरह बचेगा लोकतंत्र! 
और अगर लोकतंत्र नहीं रहा तो 
तुम्हारा पेट और चूल्हा कहाँ जाएगा? 

–सुधीर सक्सेना ‘सुधि’

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मेरा यह मानना है

मेरा यह मानना है 
मेरा भारत सब दशों से महान है।
नहीं है ऐसा कोई अन्य देश,
युगों बीतने पर भी वैसा ही है परिवेश,
विभिन्नता में एकता के लिए, प्रसिद्ध है हर प्रदेश,
प्रेम, अहिंसा, भाईचारे का जो है देता संदेश।
मेरा यह मानना है 
मेरा भारत सब देशों से महान है।
ऋषि-मुनियों की जो है तपोभूमि,
कई नदियों से भरी है ये पुण्य भूमि,
प्रकृति का है मस्त नजारा यहाँ,
छोड़ इसे जाए हम और अब कहाँ
मेरा यह मानना है 
मेरा भारत सब देशों से महान है,
जाति, धर्म का है जहाँ अनूठा संगम,
देशभक्ति की लहर में, भूल जाते सब गम,
देश के लिए मर मिटने को सब है तैयार,
अरे दुनिया वालों, हम है बहुत होशियार,
न छेड़ो हमें, कासर नहीं है हम खबरदार,
अपनी माँ को बचाने, लेगें हम भी हथियार।
मेरा यह मानना है 
मेरा भारत सब देशों से महान है

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