हमसफ़र यादों का .. . . . ..

ऐ हवा कभी तो मेरे दर से गुजर,
देख कितनी महकी यादें संभाली हैं मैंने,
संग तेरे कर जाने को,
हवा हो जाने को।
ऐ बहार कभी तो इधर भी रुख कर,
देख कई गुलाब मैंने भी रखे थे कभी,
किताबों में मुरझाने को,
पत्ता-पत्ता हो जाने को।
ऐ चाँद थोड़ी चाँदनी की इनायत कर,
कई छाले मैंने भी सजा कर रखे हैं,
बेजान बदन तड़पाने को,
रूह का दर्द छिपाने को।
ऐ चिराग घर में कुछ तो रोशनी कर,
कई बार आशियाँ जलाया है मैंने,
उजाला पास बुलाने को,
अँधेरा दूर भगाने को।
ऐ शाम ना जा, ज़रा कुछ देर ठहर,
अक्सर रात को पाया है मैंने,
तन्हाई मेरी मिटाने को,
दोस्त कोई कहलाने को।

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APOORV SRIVASTAVA द्वारा कविताएँ में प्रकाशित किया गया

धार

कौन बचा है जिसके आगे
इन हाथों को नहीं पसारा
यह अनाज जो बदल रक्त में
टहल रहा है तन के कोने-कोने
यह कमीज़ जो ढाल बनी है
बारिश सरदी लू में
सब उधार का, माँगा चाहा
नमक-तेल, हींग-हल्दी तक
सब कर्जे का
यह शरीर भी उनका बंधक
अपना क्या है इस जीवन में
सब तो लिया उधार
सारा लोहा उन लोगों का
अपनी केवल धार ।

APOORV SRIVASTAVA द्वारा कविताएँ में प्रकाशित किया गया

वो देर तक मदद के लिए रोती चिल्लाती रही

वो देर तक मदद के लिए रोती चिल्लाती रही
हर दर पर चौखट पर सर को टकराती रही
थक हार कर उसने खुद को बेड़ियों के हवाले कर दिया
उन हवाओं की हसी फिजा के हवाले कर दी
फिर वो मंजर जब थमा ,एक मजमा सा लग गया
फिर बड़ी देर तक वो भीड़ आपस मे बतियाती रही
बहुत रोई मानवता अपनी बेटी की अस्मत लुटती देख
इस नपुंसक समाज को गलियां बरसाती रही
अगले रोज अखबार मे ,एक तस्वीर आ ई लाश की
जिसकी सूरत लोगों को उसकी याद दिलाती रही
कोई बोला करती भी क्या बेचारी वो जी कर
सुन कर ये बात मुझे खुद पे शर्म आती रही ….(unknown)

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