ख्वाहिशो के पंख

कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो
इस डूबते हुआ तिनके को सहरा दे दो
कोई मेरी डूबती को कश्ती किनारा दे दो
मुझे भी कोई पतवार और माझी भी दे दो
कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो

मै नन्हे पैरो से कितनी दूर चल पाउगा
गिरते , उठते कब तक संभल पाउगा
कोई थामने वाले हाथ मुझे भी दे दो
कोई अपना साया और साथ भी दे दो
कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो ……

आस्मां को देखकर कब तक सो जाउगा
तारो मै कब तक अपनों को देखता जाउगा
कुछ परियो के कहानिया मुझे भी दे दो
टूटा तारो वाली किस्मत मुझे भी दे दो
कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो

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Kal Ki Umeed…Hindi Kavita

घर के सामने की 
कच्ची जमीन पर 
सूखी टहनियों सी 
टांगें फ़ैलाये 
बैठा बच्चा,
मुंह उठा
देखता है,
नीले आसमान की ओर उड़ता

गुलाबी गुब्बारा.

मोहल्ले के पुराने मंदिर की
ढहती दीवार फ़ोड़
निकलते पीपल की जड़ में
छिपाती है
भंडारे में मिली 
बची हुई मिठाई
फ़टी फ़्राक वाली
वह बच्ची.

पान की दुकान पर बजते
कानफ़ोड़ू गाने के 
शोर के बीच
बूढा आदमी
रटा रहा है पहाड़ा
अपने पोते को.

पीठ पर तने आसमान
पर चलते
रंगो के मेले से बेखबर
छत की दीवार पर लड़के् 
पलट रहे हैं 
आज का अखबार
नौकरी के इश्तहार की
खोज में.

अंगड़ -खंगड़ से भरे
टीन के पुराने बक्से पर
लगे ताले सी
टंगी है
उम्मीद,
कल की
सबकी नजर में.

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