अशोक चक्रधर की हास्यकविता

परेशान पति ने पत्नी से कहा –

एक मैं हूं जो तुम्हें निभा रहा हूँ

लेकिन अब,

पानी सर से ऊपर जा चुका है

इस लिये आत्म-हत्या करने जा रहा हूँ

पत्नी बोली – ठीक है,

लेकिन हमेशा की तरह

आज मत भूल जाना,

और लौटते समय

दो किलो आटा जरूर लेते आना

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शादियों का साइड इफेक्ट: हास्य कविता

मेरा हास्य कवि बनना एक हादसा था

बस में एक मैडम जी से पड़ गया वास्ता था

बात उन दिनों कि है जब मैं कवांरा

लोगों की नजर में मैं एक आवांरा था….

लेकिन मुझे तो लैला मजनू के प्यार की खोज थी

गलि से लेकर बस स्टैंड में रोज थी

ऐसे में एक दिन एक मैंडम जी मुझसे बस में टकरायीं

मेरे रोम- रोम में करेंट समायी…

और मन में विचार कौंधा कि

मेरा थोबड़ा उन्हें भा गया है क्या भाई

फिर मैंने उनपर थोड़ी सी और नजर गड़ायी

अबकी बार वे थोड़ी सी षरमायी…

लड़की हंसी तो पटीवाली बात मुझे याद आयी

फिर मोबाइल पर वे कुछ अंग्रेजी में गिटपिटाईं

जो बात मेरे भेजे में नहीं समायी

फिर मुसटंडो की जमात आयी…

जी भर के उन सबों ने मेरी की पिटायी

और मुंह पर कालीख पोतकर

गदहा पर मेरी बारात निकलवायी

और गदहे को गदहा पर देखकर…

गदहों ने जी भर कर ताली बजायी

इस प्रकार मैं हास्य कवि बन गया मेरे भाई।

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डॉ. विश्वास

“लोग कहते हैं रूह बिकती है
मैं जहाँ हूँ उधर नहीं मिलती”

“उसने सौपा नहीं मुझको मेरे हिस्से का वज़ूद
उसकी कोशिश है कि मुझसे मेरी रंजिश भी रहे”

“उस सभा में सभ्यता के नाम पर जो मौन था
बस उसी के कथ्य में मौज़ूद तल की बात थी।”

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डॉ. कुमार विश्वास

“तुम अलग हुई मुझसे साँस की खताओं से,
भूख की दलीलों से, वक्त की सजाओं से,
दूरियों को मालूम है दर्द कैसे सहना है
आँख लाख चाहे पर होठ से न कहना है
कँचनी कसौटी को खोट का निमंत्रण है
बाँसुरी चली आओ, होठ का निमंत्रण है”

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Kumar Vishwas

” कल नुमाईश में फिर गीत बिके मेरे
और मैं कीमतें ले के घर आ गया”

“पुरुवा के दामन पर दाग बहुत गहरे हों
सागर के माझी मत मन को तू हारना
जीवन के क्रम में जो खोया है, पाना है।
पतझर का मतलब है फिर वसंत आना है।”

” सूरज पर प्रतिबंध अनेको, और भरोसा रातों पर,
नयन हमारे सीख रहे हैं, हँसना झूठी बातों पर।

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