हमसफ़र यादों का .. . . . ..

ऐ हवा कभी तो मेरे दर से गुजर,
देख कितनी महकी यादें संभाली हैं मैंने,
संग तेरे कर जाने को,
हवा हो जाने को।
ऐ बहार कभी तो इधर भी रुख कर,
देख कई गुलाब मैंने भी रखे थे कभी,
किताबों में मुरझाने को,
पत्ता-पत्ता हो जाने को।
ऐ चाँद थोड़ी चाँदनी की इनायत कर,
कई छाले मैंने भी सजा कर रखे हैं,
बेजान बदन तड़पाने को,
रूह का दर्द छिपाने को।
ऐ चिराग घर में कुछ तो रोशनी कर,
कई बार आशियाँ जलाया है मैंने,
उजाला पास बुलाने को,
अँधेरा दूर भगाने को।
ऐ शाम ना जा, ज़रा कुछ देर ठहर,
अक्सर रात को पाया है मैंने,
तन्हाई मेरी मिटाने को,
दोस्त कोई कहलाने को।

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APOORV SRIVASTAVA द्वारा कविताएँ में प्रकाशित किया गया

धार

कौन बचा है जिसके आगे
इन हाथों को नहीं पसारा
यह अनाज जो बदल रक्त में
टहल रहा है तन के कोने-कोने
यह कमीज़ जो ढाल बनी है
बारिश सरदी लू में
सब उधार का, माँगा चाहा
नमक-तेल, हींग-हल्दी तक
सब कर्जे का
यह शरीर भी उनका बंधक
अपना क्या है इस जीवन में
सब तो लिया उधार
सारा लोहा उन लोगों का
अपनी केवल धार ।

APOORV SRIVASTAVA द्वारा कविताएँ में प्रकाशित किया गया

Few lines by Dr.Kumar Vishvas

भाग-दौड़ का दिन ! उम्मीद और आशा छलक-छलक
दिखी ! हम लोग लगभग एक हज़ार साल गुलाम रहे ! अलग-
अलग कबीलों के ! शायद इस लिए गुलामी इतने गहरे उतर
गयी है कि कुछ लोग बेहद हताश हैं और
बड़ी नकारात्मकता से भर गए हैं ! “अजी कुछ
नहीं हो सकता इस देश का “, “अरे यार सब
साला ड्रामा है ” ,”इनका भी कुछ दूसरा अजेंडा होगा “,
“अरे भैया बड़े-बड़े मगरमच्छ हैं ये नेता लोग, ये अन्ना जैसे
पाँच-दस

 लोगों इन का कुछ नहीं बिगाड़ सकते, कुछ दिन में
लड़-मर जायेंगे ये लोग भी ” ! सुन-सुन कर मन करता है
कि किसी प्रकार काल-चक्र को उल्टा घुमा कर इन्हें
अंग्रेजी-गुलामी के दिनों में ठेल दूँ ! अरे
नहीं होगा तो नहीं होगा ! कम से कम से मरते समय
तसल्ली तो रहेगी कि बेचैन नहीं जिए,जितनी जान
थी उसे सिर्फ जान बचाने के जुगाड़ में ही नहीं लगाया !
कल से भिड़ेंगे ….बचे तो बचा अनाचार मिटाने फिर
भिड़ेंगे ! क्यूँकी पहले लड़े थे गोरों से अब लड़ेंगे गोरों से …!
कह गए हैं चचा …
“रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल ,
जब आखँ ही से न टपका तो फिर लहू क्या है….”
APOORV SRIVASTAVA द्वारा कविताएँ में प्रकाशित किया गया

चलो उसके बिना जीकर देखते हैं, कुछ दोस्तों ने दिया जहर पीकर देखते हैं…

चलो उसके बिना जीकर देखते हैं,
कुछ दोस्तों ने दिया जहर पीकर देखते हैं….
एक दिन ये मंज़र बदल जाएगा..?
पत्थर दिल भी पिघल जाएगा………

… … गहरा है घाव सी कर देखते हैं,

चलो उसके बिना जीकर देखते हैं…..
कुछ दोस्तों ने दिया जहर पीकर देखते हैं….

बदले जो हालत वो भी बदल गया,
सूरज की गर्मी से चांद पिघल गया,
रोना बेअसर, आंसुओं को पीकर देखते हैं………

चलो उसके बिना जीकर देखते है,
कुछ दोस्तों ने दिया जहर पीकर देखते हैं…..

जिसका नाम लेता हु दिन में कई बार .
.उसी नाम ने ….जहर दिया पीकर देखते हैं…….पीकर देखते हैं………पीकर देखते हैं……….

APOORV SRIVASTAVA द्वारा कविताएँ में प्रकाशित किया गया