कौन सिखाता है चिडियों को / द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

कौन सिखाता है चिड़ियों को चीं-चीं, चीं-चीं करना?
कौन सिखाता फुदक-फुदक कर उनको चलना फिरना?

कौन सिखाता फुर से उड़ना दाने चुग-चुग खाना?
कौन सिखाता तिनके ला-ला कर घोंसले बनाना?

कौन सिखाता है बच्चों का लालन-पालन उनको?
माँ का प्यार, दुलार, चौकसी कौन सिखाता उनको?

कुदरत का यह खेल, वही हम सबको, सब कुछ देती।
किन्तु नहीं बदले में हमसे वह कुछ भी है लेती।

हम सब उसके अंश कि जैसे तरू-पशु–पक्षी सारे।
हम सब उसके वंशज जैसे सूरज-चांद-सितारे।

अपने रहे न घने नीम के साए / रमेश तैलंग

धान पराया हुआ, हल्दी परायी,
चढ़ गयी नीलामी पर अमराई
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.

अपने रहे न घने नीम के साए
गमलों में कांटे ही कांटे उगाये,
पछुवा के रंग में रंगी पुरवाई.
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.

पानी तो बिक गया बीच बाजारी,
धूप-हवा की कल आएगी बारी,
सौदागरों ने है मंडी लगाईं.
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.

रोज दिखाके नए सपने सलोने,
हाथों में दे दिए मुर्दा खिलोने,
राम दुहाई मेरे राम दुहाई.
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.